मसूरिया पहाड़ी की तपोभूमि, गुरु-शिष्य परंपरा, पैदल श्रद्धालुओं की आस्था और चमत्कारी पर्चो का सम्पूर्ण इतिहास
बाबा रामदेव जी को भगवान श्रीकृष्ण (विष्णु जी) का कलयुगी अवतार माना जाता है। उनका जन्म तंवरवंशी राजपूत राजा अजमाल जी और माता मेणादे के घर पोकरण (जैसलमेर) क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, छुआछूत और भेदभाव को समाप्त करने तथा सर्वधर्म समभाव का संदेश देने में समर्पित किया। हिंदू उन्हें 'रामदेव जी' और मुस्लिम उन्हें 'रामसा पीर' या 'बाबा पीर' के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजते हैं।
मसूरिया पहाड़ी जोधपुर का वह पवित्र स्थल है जहाँ महान योगी संत श्री बालिनाथ जी महाराज तपस्या करते थे। बालिनाथ जी, बाबा रामदेव जी के परम पूज्य गुरु थे। मान्यता है कि इसी पहाड़ी पर स्थित गुफा में बाबा रामदेव जी ने अपने गुरुदेव से आध्यात्मिक शिक्षा और दीक्षा ग्रहण की थी।
प्राचीन कथा के अनुसार, इस क्षेत्र में भैरव राक्षस का भारी आतंक था। गुरु बालिनाथ जी की शरण में आकर बाबा रामदेव जी ने बालक रूप में ही अपनी अलौकिक शक्ति से भैरव राक्षस का पीछा किया और इसी मसूरिया क्षेत्र के आसपास उसका अंत करके जनता को भयमुक्त किया था।
मसूरिया पहाड़ी और जोधपुर क्षेत्र में पानी की भीषण समस्या हुआ करती थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गुरु बालिनाथ जी की साधना और भक्तों के पीने के लिए जल उपलब्ध नहीं था, तब बाबा रामदेव जी ने अपनी दिव्य शक्ति (पर्चे) से पहाड़ी के पास भूमि से जल की धारा प्रकट कर दी।
इस पवित्र जल स्रोत को 'पर्चा नाडी' या 'पर्चा बावड़ी' कहा जाता है। श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि पर्चा नाडी के जल में स्नान करने या आचमन करने से शारीरिक व्याधियाँ, रोग और त्वचा संबंधी कष्ट दूर हो जाते हैं।
जोधपुर शहर के बीचों-बीच स्थित मसूरिया पहाड़ी केवल एक प्राकृतिक टीला नहीं, बल्कि सिद्ध महात्माओं की सदियों पुरानी साधना स्थली है। यहाँ से पूरे मेहरानगढ़ दुर्ग और नीले शहर (Jodhpur) का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। प्राचीन काल में यह पहाड़ी घने जंगलों से घिरी हुई थी जहाँ शांति और एकांत के कारण संत बालिनाथ जी ने अपनी तपस्या के लिए इस स्थान को चुना। आज यह पहाड़ी मारवाड़ के सबसे बड़े आस्था केंद्रों में से एक बन चुकी है।
हर वर्ष भाद्रपद (भादवा) माह में गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के कोने-कोने से लाखों पैदल यात्री 'जातरू' हाथों में पंचरंगी ध्वजा (नेजा) लेकर नंगे पैर यात्रा करते हैं। इन श्रद्धालुओं का मुख्य पड़ाव जोधपुर का मसूरिया मंदिर ही होता है। मान्यता है कि गुरु बालिनाथ जी के दर्शन किए बिना रामदेवरा (रुणिचा) की पदयात्रा अधूरी मानी जाती है। रास्ते भर समाज सेवियों द्वारा लगाये जाने वाले भण्डारे व सेवा शिविर इस यात्रा की अनूठी मिसाल हैं।
शुरुआती दौर में मसूरिया पहाड़ी पर केवल गुरु बालिनाथ जी की प्राकृतिक गुफा और बाबा के चरण चिह्न (पगल्या) ही स्थापित थे। समय के साथ-साथ भक्तों और 'मंदिर ट्रस्ट' के सहयोग से यहाँ भव्य मंदिर परिसर का निर्माण कराया गया। मंदिर की संगमरमर की नक्काशी, ऊँचा शिखर, विशाल प्रांगण और गुरु बालिनाथ जी की गुफा का भव्य स्वरूप आज लाखों श्रद्धालुओं के आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है।
भाद्रपद शुक्ला द्वितीया को 'बाबा री बीज' कहा जाता है, जो बाबा रामदेव जी के अवतरण का दिन है। इस दौरान मसूरिया पहाड़ी पर लखी मेला भरता है। श्रद्धालु मंदिर में बाबा की पंचरंगी ध्वजा (नेजा) और मन्नत के कपड़े के घोड़े चढ़ाते हैं। मंदिर में स्थापित बाबा के 'पगल्या' (चरण चिह्न) पर अक्षत और कुमकुम चढ़ाकर मन्नतें मांगी जाती हैं, जो तुरंत पूरी होती हैं।
मक्का-मदीना से आए 5 पीरों ने बाबा की परीक्षा लेने के लिए केवल अपने ही कटोरे (कचकोला) में भोजन करने की शर्त रखी, जो मक्का में ही छूट गए थे। बाबा ने अपनी दिव्य शक्ति से मक्का से वही कटोरे तुरंत उनके सामने प्रकट कर दिए। तब पीरों ने नतमस्तक होकर कहा— "हम तो पीर हैं, आप पीरों के पीर 'रामसा पीर' हैं!"
बाल्यावस्था में जब माता मेणादे चूल्हे पर उबलते दूध को देखकर परेशान थीं, तब बालक रामदेव जी ने केवल हाथ के इशारे से उबलते हुए दूध को शांत कर दिया था। यह उनका प्रथम घरेलू पर्चा माना जाता है।
समुद्र में व्यापार के लिए गए भक्त सेठ बोहित की नाव जब भयंकर तूफान में डूबने लगी, तब उन्होंने सच्चे मन से बाबा रामदेव जी का स्मरण किया। बाबा ने अदृश्य रूप में प्रकट होकर कंधे का सहारा देकर डूबते जहाज को किनारे लगाया।
बाबा रामदेव जी ने समाज के पिछड़े और दुखी लोगों के कष्ट हरे। उन्होंने अपनी असीम कृपा से अनगिनत कोढ़ियों का कोढ़ दूर किया और नेत्रहीनों को दृष्टि प्रदान की।
जब दर्जी ने बाबा के कपड़े के घोड़े में से थोड़ा कपड़ा चुरा लिया था, तो बालक रामदेव जी कपड़े के घोड़े पर बैठकर हवा में उड़ने लगे। दर्जी ने अपनी भूल स्वीकार की और क्षमा मांगी, जिसके बाद बाबा पुनः धरती पर उतरे।
बाबा रामदेव जी ने अपनी बहन सुगना बाई के मृत पुत्र (भांजे) को अपनी अलौकिक शक्तियों से पुनः जीवित कर दिया था। यह चमत्कार बाबा के भक्तों के प्रति अगाध प्रेम और दयालुता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
रामदेवरा (रुणिचा) धाम जाने से पहले मसूरिया पहाड़ी (जोधपुर) पर गुरु बालिनाथ जी के दर्शन करना अति अनिवार्य और शुभ माना गया है। शास्त्रों और लोक परंपरा के अनुसार, गुरु के दर्शन किए बिना शिष्य (बाबा रामदेव जी) की यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। इसीलिए देश भर से आने वाले लाखों पदयात्री सबसे पहले जोधपुर मसूरिया आकर धोक (प्रणाम) लगाते हैं।